Wednesday, 7 January 2015

आप मेरा कार्टून बना सकते हैं.

फ्रेंच भाषा की व्यंगात्मक साप्ताहिक मैगजीन चार्ली हेब्दो के दफ्तर पर हमला करके सम्पादक, चार कार्टूनिस्ट समेत एक दर्ज़न के करीब मीडियाकर्मियों की हत्या कर दी गई. मीडिया में आ रही रिपोर्ट को आधार माना जाए तो ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस्लाम के पैगम्बर हज़रत मुहम्मद साहब को पत्रिका ने अपना अतिथि सम्पादक बना कर आपत्तिजनक लेख लिखे एवं कार्टून बनाया था.
भारत में सोशल मीडिया पर इसे लेकर हो रही बहसों में कई पक्ष देखने को मिल रहे हैं.
हिन्दू कट्टरपंथियों ने इस हमलें के बाद इस्लाम और मुसलमानों को आतंकवाद से सीधे तौर पर जोड़ कर तीखे शब्द लिखें हैं. उनका कहना है कि, ‘शांति का मज़हब,दुनिया भर में अशांति फैला रहा है. वैश्विक शांति के लिए इस्लाम सबसे बड़ा ख़तरा है.’ वहीँ दूसरी तरफ फेसबुकिया नास्तिकों जिन्होंने कभी सरस्वती शिशु मंदिरों से अपनी दीक्षा पूर्ण की थी वे भी इस्लाम और मुसलमानों को अपमानित करने में किसी तरह की कमी नहीं रहने देना चाह रहे हैं. इनके निशाने पर हमलावर कम, भारतीय मुसलमान ज्यादा हैं. ऐसा करने वालों में वे भी शामिल हैं जिन्हें लगता है मुसलमानों की निंदा और इस्लाम को भला बुरा कहे बिना सेक्युलर जमात में उनकी एंट्री बैन हो जाएगी.
पढ़ा लिखा तबका इस पूरी घटना की निंदा सधे हुए शब्दों में कर रहा है. वह पूरे सम्प्रदाय को इसका दोषी करार नहीं दे  रहा है लेकिन इस्लाम से ज़रूर जोड़ कर देख रहा है. वहीँ भारतीय मुसलमानों की तरफ से हमेशा की तरह वैश्विक पटल पर घटी हिंसक वारदातों के बाद निंदा और आलोचना का दौर तो शुरू हुआ लेकिन वे उस ट्रैप में फंस गए जिसमे उन्हें हमेशा फंसाया जाता है. भारतीय मुसलमानों को विश्व में घटी मुस्लिम जगत की दूसरी किसी सकारात्मक घटना पर प्रतिक्रिया नहीं मांगी जाती लेकिन जैसे ही कोई आतंकी घटना होती है तो लोगों का समूह उन्हें घेर लेता है और यह मनवाने की भरसक कोशिश करता है की देखो कैसा है तुम्हारा इस्लाम. इसके बाद वह हफ़्तों कुरान और हदीसों से शांति और सौहार्द की आयतों एवं बातों को उठा उठा कर दिखाता रहता है जिसका असर उन पर रत्ती भर नहीं पड़ता जो ऐसी घटनाओं के बाद इस्लाम और भारतीय मुसलमानों को अपमानित करने में लगे होते हैं. जो लोग सोशल मीडिया पर तरह तरह के विचारों की दूकान चला रहे हैं यदि वे इस तरह की घटना पर पूरी कौम को नहीं घेरेंगे तो उनका औचित्य समाप्त हो जायेगा. मेरे कहने का मतलब यह है की ऐसी बहस से बचना चाहिए जिसका कोई ओर छोर न हो. हिंसा का विरोध ज़रूर होना चाहिए लेकिन ऐसी हिंसात्मक कार्यवाइयों की आड़ में वैचारिक समूहों द्वारा की जा रही बहसों का निहितार्थ समझना पड़ेगा.  
चार्ली हेब्दो मैगजीन व्यंग के तीखे तेवरों की वजह से कट्टरपंथियों की आलोचना की शिकार होती रही है लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर इस्लाम के पैगम्बर का कार्टून बनाना कहीं से भी न्यायोचित और तर्क संगत नहीं ठहराया जा सकता. इस्लाम मूर्तिपूजा की मनाही करता है. हज़रात मुहम्मद की न तो कोई तस्वीर है और न ही ऐसी किसी रचना की इजाज़त इस्लाम देता है. यह साफ़ तौर पर दूसरों की धार्मिक आस्था, विश्वास और स्वतंत्रता के साथ छेड़छाड़ है. 
यदि हिन्दू देवी देवताओं अथवा अन्य किसी धर्म एवं वर्ग के महापुरुषों की तरह इस्लाम धर्म के किसी महापुरुष (हज़रात मुहम्मद) की कोई छाया प्रति अथवा पेंटिंग मौजूद होती तो निसंदेह किसी को आपत्ति नहीं होती लेकिन यहाँ तो मुहम्मद की तस्वीर या कार्टून जैसा कुछ उपलब्ध नहीं है. जिन सज्जन लोगों को लगता है मुहम्मद का कार्टून उदारवादी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया तो वे फ्रांस में हिजाब पर पाबंदी को किस उदारवाद की श्रेणी में रखेंगे. स्कूल में हिजाब लगा कर जाने वाली नौ साल की बच्ची को लेकर पूरे देश में माहौल गर्म हुआ और अंततः पूरे फ्रांस में हिजाब पर पाबंदी लगा दी गई. द गार्जियन की खबर है की इस कार्यवाई से मुस्लिम महिलाएं अपने घरों में कैद हो कर रह गईं हैं. किसी भी तरह के व्यवसायिक कार्य से उन्हें बिलकुल अलग थलग होना पड़ रहा है. यदि मुस्लिम महिलाओं की तरफ से हिजाब पर पाबन्दी की मांग की गई होती तो वे घरों के भीतर क्यों बैठ जाती. फ्रांस की सरकार ने कहा कि, ‘देश के सेक्युलर फैब्रिक को बनाए रखने के लिए हिजाब को बैन करना ज़रूरी था.’ तो क्या उस सरकार को देश में रह रहे मुसलमानों की जीवन शैली की परवाह नहीं करनी चाहिए थी? क्या फ्रेंच मुसलमानों ने फ्रांस में रह रहे दूसरे धार्मिक समूहों की महिलाओं को हिजाब पहनने की वकालत की? नहीं की. तो फिर इस्लाम धर्म को मानने वाले हिजाब लगा लें या फांसी लगा लें,यदि उन्हें हिज़ाब से दिक्कत नहीं है तो सरकारी कानूनों के माध्यम से कोई राज्य अपने नागरिकों के आधारभूत अधिकारों का हनन आखिर कैसे कर सकता है? क्या फ्रांस ने ईसाईयों को अपने सीने पर क्रास लटकाने की पाबंदी लगाई,नहीं.

हमें यह समझना होगा कि पैगम्बर हज़रत मुहम्मद की तस्वीर अथवा कार्टून को मार्केट, रिलिजन इकोनामी बिजनेस के तौर पर परोस सकती है. एकेश्वरवाद के सिद्धांत वाला धर्म बहुदेववाद में फंस सकता है. जो की इस्लाम के आधारभूत सिद्धांत के एकदम विपरीत है. मैं यह भी कहता हूँ कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का पैमाना दो मुंह वाला नहीं होना चाहिए. जिन संस्कृतियों और धर्मों में उपासकों की तस्वीरें अथवा चित्र मिलते हैं, उन्हें दिखाना अथवा पूजना आस्था आधारित हो सकता है लेकिन जिस मज़हब ने ऐसे किसी आधार को सिरे से खारिज कर दिया है वहां मूर्ति अथवा तस्वीर या इससे मिलती जुलती चीजों को दिखाना और थोपना अभिव्यक्ति की आज़ादी बिलकुल नहीं. हिंसा ऐसे कृत्यों का जवाब नहीं हो सकता. ऐसी घटनाए भविष्य में न हो इसलिए हज़रत मुहम्मद का कार्टून बनाने की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए. आप मेरा कार्टून बना सकते हैं. इस्लाम की आलोचना मन भर कर, कर सकते हैं. मुझे कोई आपत्ति नहीं. लेकिन जिस कृत्य से किसी की मज़हबी पहचान,संस्कृति एवं सभ्यता पर बेवजह का सवाल खड़ा किया जाएगा उसकी आलोचना तो करनी ही होगी और मैं करूँगा. 

11 comments:

  1. बहुत उम्दा लेख अनस भाई
    धन्यवाद

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  2. Sahi aur saamyik lekh!
    samvedansheelta to rachnakarm ka zaroori tatv hai, jise raundna hi kranti samajh liya gaya hai is ashleel daur me, par iska parinaam kabhi kabhi bhayanak hota hai.
    Paris-killings ki jitni ninda ki jaye kam hai. Poonjiwad ke in gundon se sakhti se nibta jana chahiye.

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  3. शायद आपके इस बात को वो समझ पाये....

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  4. बहुत ही उम्दा....

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  5. आज पेरिस में हुए हमले को लेकर मेरे कुछ दोस्त मुसलमानों के खिलाफ ऐसे-ऐसे पोस्ट लिख रहे हैं मानो उस हमला का जिम्मेदार हम हिन्दुस्तानी मुसलमान है.... ये वही दोस्त हैं जो असम में उग्रवादियों द्वारा की गई जनसंहार पर ऐसे चुप थे मानो कोई सांप सूंघ गया हो.... असम जनसंहार के सभी उग्रवादी तो हिन्दू थे लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सभी हिन्दू उग्रवादी हो गए.... ये मैं भी मानता हूँ कि आज पेरिस में जो कुछ भी हुआ वो बेहद निंदनीय है.....!

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  6. शानदार लेख, कलम और कलाम की अच्छी पेशकश. :)

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  7. बहुत ही शानदार लेख आनिश जी....
    फ्रांस के अखबार में कल जो कुछ बर्बर हत्याकांड हुआ उसे सही तो कतई नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन क्या किसी धर्म की खिल्ली उड़ाना या किसी मजहब के खिलाफ लिखना पत्रकारिता है ? क्या धार्मिक प्रतीकों के अपमान से हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रगतिशील उदाहरण पेश कर रहे हैं ?
    समाज की बुराईयों को कबीरदास ने भी उजागर किया है लेकिन धर्म पर अनैतिक चोट नहीं की....

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  8. मकबूल फ़िदा हुसैन ने जो हिंदू देवी -देवताओं के सैकडों अश्लील न्यूड कार्टून ,चित्र बनाए थे वो सब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की श्रेणी में थे और सही थे लेकिन फ्रेंच पत्रिका द्वारा मुहम्मद साहब का कार्टून बनाना बिल्कुल गलत !!! आपके एनालिसिस की दाद देनी पड़ेगी ...वाकई क्या दोहरा मापदंड है अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर ...

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  9. Ya, even a cartoon or statement against Holocaust, straight takes a person to jail. A cartoonist Sine who worked for the same paper was sacked by its editor because the cartoon was anti-Semitic.

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