Wednesday, 9 December 2015

अब देखो, मैं हुआ न खुदा.

उसे लगने लगा था, ज़िंदगी माने कुछ भी नहीं. खुदा से जो खौफ था वो भी ख़त्म ही हो गया था. जो बचा खुचा था वह शराब पी कर पूरा कर देता था. शराब और तन्हाई में इस कदर डूबने लगा जैसे दुनिया का सबसे बड़ा जानकार हो. कोई उससे मिलने जाता तो वो उसे बहुत देर तक घूरता रहता. सामने वाला डर जाए,बिल्कुल उस तरह से. आँखें बंद बंद सी. चेहरे पर दाढ़ी. कहीं सुफैद तो कहीं काली. ऐसे ही एक मर्तबा मैं उसके नजदीक चला गया. सवालों के साथ. मुझे पता था उसका जो जवाब हैं उसे सच मान लूंगा तो बिल्कुल उसकी तरह हो जाऊंगा इसलिए मन को मजबूत किया और खुद से कहा, ‘देखो मियाँ,आदमी तो है सच्चा लेकिन इसकी सच्चाई से सिर्फ इसे ही फायदा है. तुम्हें नुकसान. इस लिए झूठ ही समझना. खाली वक्त में इससे बेहतरीन जमूरा नहीं मिलेगा.’मैं खुद से बातें कर ही रहा था की सामने से वो आ गया. मैं उसके बगल से गुजर भी जाता तो उसे ख्याल ही न रहता. खैर, मैंने ही टोका, ‘सलाम वाले कुम चचा.’

न तो मेरा नाम सलाम है न तो चचा,तुमसे कई बार कहा है की मुझे मेरे नाम से बुलाया करो. खुदा नाम है मेरा. आइंदा तुमने मुझे मेरे नाम से नहीं पुकारा तो तुम्हारे किसी भी सवाल का जवाब नहीं दूंगा.लेकिन मैं उस इंसान को खुदा कैसे कह सकता हूं. अजीब कशमकश,अजीब उलझन. कैसा बेहूदा आदमी है. खुद को खुदा कहलवाना चाहता है. क्या सोच रहे हो मियाँ. नाम लेते हो मेरा या मैं जाऊं. हाँ खुदा जी, कहाँ जाएंगे. इसके सिवा ठिकाना ही कहाँ हैं आपका.चलो ,तुमने तस्लीम तो किया कि मैं खुदा हूं. अरे नहीं..मैंने तो सिर्फ नाम लिया है. और नाम रख भर लेने से कोई खुदा थोड़ी न हो जाता है. मतलब जुबान पर खुदा है और दिल में खुदा नहीं. जाओ फिर.. आज से तुमसे मुलाकातें बंद. ओह्हहो, क्या मुसीबत है इस आदमी की. मैंने कहा तो खुदा, अब क्या और कैसे कहूँ.हा हा , छोड़ो ,मैं तुम इंसानों जैसा नहीं हूं. मैं जो हूं वो तुम नहीं मानोगे तो मैं ज़बरदस्ती नहीं करूंगा मानने की. यही तो फर्क है खुदा और इंसान में. अब देखो, मैं हुआ न खुदा. 

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